आर्थिक सर्वे ने इकोनॉमी पर मोदी के दावों की खोली पोल, विकास दर को लगेगा जोरदार झटका

Written by Sabrangindia Staff | Published on: August 12, 2017
मोदी सरकार देश की जनता को आर्थिक विकास के सुनहरे सपने दिखा रही है। अविश्वसनीय आंकड़ों और जुमलेबाजी के सहारे यह सरकार भारत को सबसे तेज गति से तरक्की करने वाली अर्थव्यवस्था बताने पर तुली है, जिस पर विदेशी निवेशक टकटकी लगाए बैठे हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था की हकीकत हर दिन खुलती जा रही है।

Indian Economy

 शुक्रवार को लोकसभा में पहली बार पेश मध्यावधि आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि सरकार ने 7.5 फीसदी आर्थिक विकास दर का जो लक्ष्य रखा है वह हासिल होने वाला नहीं है। रुपये की कमजोरी, किसानों की कर्ज माफी, बैंकों के डूबते ऋण के कारण सरकारी बैंकों और निजी कंपनियों की पतली हालत के अलावा जीएसटी पर अमल ने इस लक्ष्य को मुश्किल बना दिया है।

सर्वे के मुताबिक सकल घरेलू उत्पाद, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक,ऋण वितरण, निवेश वृद्धि और क्षमता उपयोग के आंकड़ों पर गौर करने से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही से ही अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो गई थी। जबकि फरवरी में आए आर्थिक सर्वे में निर्यात में उछाल और नोटबंदी के बाद के दौर में उपभोग में अनुमानित बढ़ोतरी के आधार पर आर्थिक विकास दर 6.75 से 7.5 फीसदी होने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन कहीं से अब यह लक्ष्य हासिल होता नहीं दिखता। इस सर्वे में कहा गया है कि विकास दर कम होने की एक वजह किसानों की आय में कमी है।

दरअसल नोटबंदी ने सबसे ज्यादा नुकसान किसानों और मजदूर वर्ग को पहुंचाया। किसान अपनी फसल बेच नहीं पाए और नई फसल के लिए बीज, खाद  और दूसरे कृषि उपकरण नहीं खरीद पाए। इससे उनकी आमदनी पर सीधे प्रहार हुआ। उसी तरह मजदूरों के पास काम न रहने से उपभोक्ता बाजार पर इसका असर हुआ। इकोनॉमी पर इसके बाद जीएसटी ने असर दिखाया। जीएसटी की आशंकाओं की वजह से उद्योग और कारोबारी जगत ने अपनी गतिविधियां रोक दीं। इसने अर्थव्यवस्था की रफ्तार और थाम दी। अर्थव्यवस्था के हाल के आंकड़े भी निराशाजनक है। कोर सेक्टर के प्रदर्शन से लेकर औद्योगिक उत्पादन तक, हर जगह निराशा का आलम है। ऐसे में अर्धवार्षिक आर्थिक सर्वे के आंकड़े और निराश करते हैं। ये आंकड़े सीधे-सीधे वित्त मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व पर सीधे सवाल खड़े करते हैं। 
 

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